Uttarakhand News

Date: 2016-Nov-18

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स्थाई राजधानी पर असमंजस क्यों -जयसिंह रावत

उत्तराखंड की स्थाई राजधानी का सवाल प्रदेश के दोनों ही प्रमुख राजनीतिक दलों के लिये वह गर्म दूध हो गया जोकि न तो निगले जा रहा है और ना ही उगलते बन रहा है। प्रदेश में सत्ताधारी कांग्रेस गैरसैण के मुद्दे को चर्चा केकेन्द्र में तो ले आई मगर वह उसे क्या नाम दे, इस पर अटक गयी है। इसी तरह प्रमुख विपक्षी दल भाजपागैरसैण में फिजूलखर्ची का रोना तो रो रही है मगर वह भी वहां न तो राजधानी की जैसी सुविधाऐं जुटाने काविरोध कर पा रही है और ना ही उसे स्थाई या ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने के लिये सरकार पर दबाव बनाने कीहिम्मत जुटा पा रही है।
 
भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने 18 मई 2015 को उत्तराखंड विधानसभा मेंअपने ऐतिहासिक भाषण में गैरसैण कोप्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनायेजाने की बात कह चुके हैं। लेकिनउत्तराखंड की कांग्रेस सरकार है किराष्ट्रपति द्वारा कही गयी बात को भीदुहराने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है।जबकि चमोली गढ़वाल के गैरसैण मेंविधानसभा का लगातार दूसरा सत्रआयोजित हो रहा और गैरसैण के हीनिकट भराड़ीसैंण में राजधानी का जैसाढांचा शक्ल लेता जा रहा है। दो सत्रगैरसैण में चलने के बाद तीसरा सत्र भराड़ीसैण स्थित नवनिर्मित विधानभवन में भी आहूत हो गया। वहांविधानभवन ही नहीं बल्कि विधायक आवास भी तैयार हो चुके हैं और मिनी सचिवालय का ढांचा भी लगभगतैयार ही है।
लेकिन जब गैरसैंण को राजधानी या ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाये जाने की बात आती है तो मुख्यमंत्री यह तोकह देते हैं कि उनकी सरकार उसी दिशा की ओर बढ़ रही है। मगर वे यह घोषणा करने से साफ बच निकलते हैं किगैरसैण ही वास्तव में भविष्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी है। इसी तरह सत्ता की प्रबल दावेदार भाजपा गैरसैण मेंराजधानी की जैसी सुविधाएं जुटाने का न तो समर्थन कर पा रही है और ना ही वह विरोध की स्थिति में है। भाजपाएक तरफ तो प्रस्ताव आने पर समर्थन की बात करती है, क्योंकि उसे पता है कि कांग्रेस सरकार में इतना बड़ाकदम उठाने की हिम्मत नहीं है। दूसरी तरफ भाजपा वहां विधानसभा सत्र आहूत करने का फिजूलखर्ची काआरोप भी लगा रही है। गैरसैण में आहूत पिछले दोनों सत्रों भाजपा सदस्य जिस तरह आपा खो बैठे उससे गैरसैणके बारे में उनकी अरुचि का खुलासा हो गया।
दरअसल गैरसैंण के मामले में कांग्रेस सरकार और खासकर हरीश रावत ने कुछ हिम्मत तो जरूर जुटाई है, मगरभविष्य की राजधानी के बारे में छाये हुये कोहरे को हटाने की हिम्मत वह भी नहीं जुटा पाये। कांग्रेस सरकार केसंकोच का एक कारण यह भी हो सकता है कि गैरसैण को स्थाई राजधानी घोषित करना न तो इतना आसान हैऔर ना ही इतना व्यवहारिक। ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषणा करने का मतलब है वहां स्थाई राजधानी कीमांग को सीधे-सीधे नकार देना।
वैसे भी राजधानी के चयन के लिये गठित दीक्षित आयोग ने तो 2 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद जो रिपोर्टसरकार को सौंपी थी उसमें गैरसैण को सीधे सीधे ही रिजेक्ट कर दिया था। दीक्षित आयोग ने गैरसैण के साथ हीरामनगर तथा आइडीपीएल ऋषिकेश को द्वितीय चरण के अध्ययन के दौरान ही विचारण से बाहर कर दिया थाऔर उसके बाद आयोग का ध्यान केवल देहरादून और काशीपुर पर केन्द्रित हो गया था। हालांकि दीक्षित आयोगने गैरसैण के विपक्ष में और देहरादून के समर्थन में जो तर्क दिये थे वे कुतर्क ही थे। जैसे कि उसने गैरसैण काभूकंपीय जोन में और देहरादून को सुरक्षित जोन में बताने के साथ ही गैरसैंण में पेयजल का संभावित संकटबताया था। आयोग का यह अवैज्ञानिक तर्क किसी के गले नहीं उतरा था। आयोग ने मानकों की वरीयता केआधार पर गैरसैंण को केवल 5 नम्बर और देहरादून को 18 नंबर दिये थे। यही नहीं आयोग ने देहरादून केनथुवावाला-बालावाला स्थल के पक्ष में 21 तथ्य और विपक्ष में केवल दो तथ्य बताये थे, जबकि गैरसैण के पक्ष में4 और विपक्ष में 17 तथ्य गिनाये गये थे। फिर भी आयोग ने जनमत को गैरसैण के पक्ष में और देहरादून केविपक्ष में बताया था। वास्तव में पहाड़ों से बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन के कारण प्रदेश का राजनीतिक संतुलनजिस तरह गड़बड़ा़ रहा है उसे देखते हुये प्रदेश की सत्ता के प्रमुख दावेदार कांग्रेस और भाजपा भी खुलकर गैरसैणके समर्थन में आने से कतरा रहे हैं। वैसे भी जब राजधानी अंगद की तरह कहीं पैर रख देती है तो उसे उखाड़नालगभग नामुमकिन ही हो जाता है।
सन् 1856 में ब्रिटिश कमिश्नर लुशिंगटन ने गैरसैण के लोहबा में पेशकारी दफ्तर बनाया  था, जिसमंे नायबतहसीलदार को रखा गया। उन्होंने इसे सबसे बेहतरीन स्थान बताते हुए प्रशासन का केंद्र बनाने का प्रस्ताव भीप्रांतीय सरकार को भेजा था तथा सिल्कोट टी स्टेट और अन्य चाय बागानों को मिलकर चाय बगान कामुख्यालय भी बनाया था। भराडी़सैण के पास ही रीठिया चाय बागान के पास 100 हैक्टेअर, सिलकोट के पास300 हैक्टेअर और बेनीताल चाय बागान के पास 350 हैक्टेअर जमीन पड़ी है। इन बागानों के मालिक गैरसैंण मेंराजधानी आ जाने की प्रतीक्षा में हैं ताकि इन विशाल बागानों पर शानदार रिसार्ट बनाये जा सकें। प्रख्यातसमाजसेवी स्वर्गीय स्वामी मन्मथन और कम्युनिस्ट नेता विजय रावत तथा मदनमोहन पाण्डे इन चायबागानों के अधिग्रहण के लिये 1978 आन्दोलन भी चला चुके हैं।
सन् 2002 में जब उत्तराखंड विधानसभा का पहला चुनाव हुआ था तो उस समय 40 सीटें पहाड़ से और 30 सीटेंमैदान से थीं। इसलिये सत्ता का संतुलन पहाड़ के पक्ष में होने के कारण पहाड़ी जनभावनाओं के अनुरूप गैरसैणको भी देहरादून से अधिक जनमत हासिल था। यह जनमत उसी दौरान आयोग द्वारा एकत्र किया गया था। सन्2006 में हुये परिसीमन के तहत पहाड़ की 40 सीटों में से 6 सीटें जनसंख्या घटने के कारण घट गयीं और मैदानकी 30 सीटें बढ़ कर 36 हो गयीं। जबकि पहाड़ में 10 जिले हैं और मैदान में देहरादून समेत केवल 3 ही जिले हैंऔर इन तीन जिलों में ही उत्तराखण्ड की राजनीतिक ताकत सिमटती जा रही है। अगर यही हाल रहा तो सन्2026 के परिसीमन में पहाड़ में 27 और मैदान में 43 सीटें हो जायेंगी। पहाड़ से वोटर ही नहीं बल्कि नेता भीपलायन कर रहे हैं। राज्य के तीन पूर्व मुख्यमंत्री चुनाव लड़ने मैदान में आ गये हैं। यकीनन मैदानी वोटरों केरूठने के डर से भी प्रमुख दलों के राजनीतिक नेता खुलकर गैरसैण की तरफदारी करने से कतरा रहे हैं।
गैरसैंण केवल पहाड़ के लोगों की भावनाओं का प्रतीक नहीं बल्कि इस पहाड़ी राज्य की उम्मीदों का द्योतक भी है।गैरसैण के भराड़ीसैंण में अघोषित ग्रीष्मकालीन राजधानी का आधारभूत ढांचा खड़ा किये जाने की शुरूआत केसाथ ही वहां एक नये पहाड़ी नगर की आधारशिला भी पड़़ गयी है। वह नवजात शहर स्वतः ही देहरादून के बादसत्ता का दूसरा केन्द्र बन जायेगा। सत्ता के इस वैकल्पिक केन्द्र में स्वतः ही नामी स्कूल और बड़े अस्पताल आदिजनसंख्या को आकर्षित करने वाले प्रतिष्ठान जुटने लग जायेंगे। अगर पहाड़ी नगर शिमला और मसूरी में देश केनामी स्कूल खुल सकते हैं तो फिर गैरसैंण में क्यों नहीं। सत्ता ऐसी मोहिनी है कि निवेशक खुद ही गैरसैंण की ओरखिंच आयेंगे। लोगों का मानना है कि गैरसैण में ग्रीष्मकालीन राजधानी बनने से प्रदेश की राजनीतिक संस्कृतिमें बदलाव आयेगा और उसमें पहाड़ीपन झलकने लगेगा। पहाड़ का जो धन मैदान की ओर आ रहा है वह वहींस्थानीय आर्थिकी का हिस्सा बनेगा। प्रदेश के हर कोने से जब गैरसैण जुड़ेगा तो इन संपर्क मार्गों पर छोटे-छोटेकस्बे उगेंगे और उससे नया अर्थतंत्र विकसित होगा।

 

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Date: 2017-Jan-26

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जागर गायिका बसंती विष्ट को पद्मश्री

जागर गायिका बसंती विष्ट को पद्मश्री । उत्तराखंड लोकगायिकी का सम्मान

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Date: 2017-Apr-05

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प्रेम पंचोली को केसी सुब्रह्मण्यम मीडिया 

 

उत्तराखंड के उत्तरकाशी के कफनौल गांव के निवासी पर्यावरण प्रेमी प्रेम पंचोली को 2016 के सी सुब्रह्मण्यम राष्ट्रीय मीडिया अवार्ड से सम्मानित किया गया। उनके साथ देशभर से 16 पत्रकारो के को भी सम्मानित किया गया है।  नेशनल फाउंडेशन फॉर इंडिया ने उत्तराखंड से किन्हीं दो प्रमुख विषयों पर अध्ययन के लेख आमंत्रित किए थे। प्रेम पंचोली ने पानी का शुद्धीकरण एवं स्वच्छता: उत्तराखंड एक अध्ययन, विषय को लेकर 13 लेख लिखे।  बातचीत में लेखक प्रेम पंचोली ने बताया कि फाउंडेशन की शर्त के अनुसार उनको 10 लेख लिखने थे, लेकिन उन्होंने इस विषय पर 13 लेख लिखे। जो प्रमुख समाचार पत्रों और डिजीटल मीडिया सहित इंडिया वाटर पोर्टल पर भी प्रकाशित हुए हैं। नई दिल्ली में प्लानिंग कमीशन की पूर्व उपाध्यक्ष डॉ. सईदा हमीद ने प्रेम पंचोली को सम्मानित किया। इसमें प्रशस्ति पत्र और ट्रॉफी  के साथ सवा लाख रुपये प्रदान किए गए

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Date: 2017-Apr-05

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CM शपथ लेते हुये

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Date: 2017-Sep-09

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हिमालय दिवस पर विशेष

हिमालय दिवस पर विशेष :जगत सिंह जंगली

 उत्तराखंण्ड में मिश्रित वनों की अवधारणा को को मजबूत करने और उसे धरती पर साकार करने में जगत सिंह ‘जंगली’ की बड़ी भूमिका है। रूद्रप्रयाग जिले के कोटमल्ला गांव निवासी 62 वर्षीय जगत सिंह को वन एवं पर्यावरण प्रेम ने ही उन्हें जंगली बना दिया। बुनियादी स्कूली शिक्षा पाए एवं बी.एस.एफ. से सेवानिवृत जंगली ने यह भी साबित कर दिखाया है कि प्रकृति से बड़ा कोई शिक्षक नहीं होता।

24 वर्ष की उम्र से मिश्रित वनों के रोपण और संरक्षण मे जुटे जंगली ने अपने गांव कोटमल्ला में दो हेक्टेयर से अधिक ऊबड़-खाबड़ पथरीली पहाड़ी को सालों की मेहनत के बाद वनखेती के रूप में बदल डाला। उन्होंने जमीन को ही नहीं बदला, बल्कि पर्यावरण और वनविज्ञान के क्षेत्र में काम करने वाले बड़े-बड़े वैज्ञानिकों की सोच भी बदल डाली। जंगली ने पंद्रह वर्षो की मेहनत के बाद विभिन्न ऊंचाईयों और पर्यावरणीय स्थितियों में उगने वाले लगभग 60 प्रजातियों के चालीस हजार से अधिक पेड़ों वाला मिश्रित वन विकसित किया।

इंदिरा गांधी वन मित्र पुरस्कार के साथ ही उत्तराखंड के पूर्व राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला द्वारा पुरस्कृत हो चुके जंगली के मिश्रित वन में चायपत्ती से लेकर हल्दी तक के पौधे लगाए गए हैं। जंगली के इस मिश्रित वन से अब गांव के लोगों को चारा पत्ती तो मिलती ही है, वन और पर्यावरण संरक्षण की प्रेरणा भी मिलती है। जंगली से प्रेरणा लेकर अब आसपास गांव के लोग भी मिश्रित वन की इस पद्धति को अपनाने लगे हैं।

जंगली कहते हैं, ‘अगर सरकार मिश्रित वन के इस सूत्र को उत्तराखंड सहित देशभर में लागू करे तो यह पर्यावरण संरक्षण के साथ ही वनों को अधिक उत्पादक और अधिक उपयोगी बनाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम हो सकता है।  पहाड़ में अगर गांव के आसपास मिश्रित वन होंगे तो महिलाओं के लिए चारा पत्ती का संकट कितना कम हो जाएगा।’ एक सुखद पहलू यह भी है कि अब सिर्फ जंगली ही अपने अनुभव बांटने के लिए देशभर में नहीं घूमते बल्कि देशभर के वन एवं पर्यावरण पर अध्ययन कर रहे छात्र और शोद्यार्थी भी जंगली के जंगल को देखने पहुंचते हैं। 

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